

वर्ग संघर्ष मानव इतिहास की मूल शक्तियों में से एक है जिसने समाजों की संरचना बदली और विश्वव्यापी क्रांतियों का सूत्रपात किया।
यूरोप में सामंतवाद से पूंजीवाद का संक्रमण, इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के बाद मजदूर आंदोलन, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, 1917 की रूसी क्रांति तथा चीन, क्यूबा और लैटिन अमेरिकी आंदोलनों में उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण व श्रमशक्ति के शोषण के विरुद्ध संघर्षों ने राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं को उलट दिया।
वर्ग विरोध की इसी वैश्विक पृष्ठभूमि में भारत का वर्ग संघर्ष केवल पूँजी और श्रम तक सीमित नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था, जातीय वर्चस्व, भूमि संबंधों और राजनीति तथा सत्ता की जटिल गाँठों से जुड़ा है।
भारत में वर्ग संघर्ष वर्ण जाति, औपनिवेशिक शोषण, औद्योगिक पूँजीवाद और वैश्विक पूँजी की बहुस्तरीय प्रक्रिया है जो आज भी सक्रिय है। प्राचीन मध्यकालीन समाज में वर्ण व्यवस्था ने श्रम विभाजन व आर्थिक पदानुक्रम को वैध बनाया।
कृषि अर्थ व्यवस्था में जमींदार, सामंत व उच्च वर्णीय किसान वर्ग का प्रभुत्व रहा, जबकि भूमि हीन श्रमिक, निम्न जातियाँ व वंचित समुदायों का कोई अधिकार न था। विद्रोहों की अंतर्धारा में वर्गीय असमानता व संसाधन कब्जे का आक्रोश झलकता था।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने जमींदारी व राजस्व व्यवस्था तोड़ी, रैयतों, किसानों व जमींदारों में तनाव पैदा किया तथा उद्योग, रेलवे व खदानों से मजदूर वर्ग का निर्माण हुआ। कर संग्रह, कच्चा माल व सस्ते श्रम शोषण से किसान व आदिवासी विद्रोह भड़के।
19वीं सदी के अंत में संगठित मजदूर वर्ग ने कारखाना मालिकों व औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया। प्रथम विश्व युद्ध, रूसी क्रांति व आर्थिक संकट ने वर्ग चेतना जगाई, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनी।
स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय नेतृत्व की राजनीतिक मुक्ति प्राथमिकता के साथ मजदूर किसान संगठनों ने भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन व समानता माँगी।
आदिवासी, किसान व मजदूर हड़तालों ने वर्गीय असंतोष दिखाया। स्वतंत्रता के बाद संविधान ने समाजवादी पथ अपनाया, पर भूमि स्वामियों, उच्च जातीय व पूँजीपति वर्ग का वर्चस्व कायम रहा।
आधे अधूरे भूमि सुधार व नक्सल आंदोलन ने असमान भूमि वितरण व जातीय उत्पीड़न उजागर किया। शहरों में मजदूरों को अधिकार मिले, पर सत्ता अक्सर पूँजी के पक्ष में रही।
भारत में वर्ग संघर्ष वर्ण जाति से घुला हुआ है। डॉ. अंबेडकर व मार्क्स के संवाद में कहा गया कि वर्ण संघर्ष के बिना वर्ग संघर्ष अधूरा है।
सवर्ण वर्चस्व ने दलित, पिछड़े, आदिवासी व अल्प संख्यकों की अधीनता बनाए रखी। उदारीकरण ने मध्यवर्ग व पूँजीपतियों को लाभ दिया, पर असंगठित मजदूर, लघु किसान व अनुबंध श्रमिक असुरक्षित हुए। वर्ग संघर्ष खेत खदानों, सर्विस सेक्टर व झुग्गियों तक फैला रहा।
यहाँ वर्ग,आर्थिक स्थिति के साथ सांस्कृतिक पूँजी, जातीय पहचान व राजनीतिक पहुँच निर्धारित करता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सवर्ण विरोधी नारे वर्ण व वर्ग तनावों का संक्षेप हैं। बहुजन समाज पार्टी के उदयकाल में प्रतिनिधित्व राजनीति थी।
विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय मंडल विरोधी आंदोलन आरक्षण के विरुद्ध मध्यम वर्गीय आक्रोश था। आज यूजीसी नीतियों के विरुद्ध प्रतिरोध निजीकरण व बाजारीकरण से जुड़ा हुआ है जो वंचितों को प्रभावित करता है।
मंडल आंदोलन अवसरों की साझेदारी के विरुद्ध था, जबकि वर्तमान स्वर संरचनात्मक असमानताओं पर हैं। सवर्ण विरोधी भाषा संरचना विरोध से द्वेष की ओर मुड़ सकती है। यह चिंताजनक है क्योंकि युवा राष्ट्र की दिशा तय करते हैं।
विश्वविद्यालय असहमति पोषित करें, पर वह विवेकपूर्ण हो, वर्ग ध्रुवीकरण लोकतंत्र को प्रभावित करता है। अंततः वर्ग संघर्ष का मूल प्रश्न,संसाधनों व सत्ता पर नियंत्रण है।
अतः वर्ग संघर्ष स्वरूप बदल कर फिर फिर प्रगट होता रहता है। तार्किक,सम वितरण,नैसर्गिक न्याय ही वर्ग संघर्ष का किंचित समाधान है। सहयोग: विनायक फीचर्स
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