

उत्तराखंड राज्य की तकदीर और तस्वीर देखिये कितनी बड़ी विडंबना है जिस कांग्रेस के शासन से ऊबकर राज्य की जनता ने उत्तराखंड अलग प्रदेश बनाया जाए यह सोचकर इसके लिए प्राणों की आहुतियां दी!
वही कांग्रेस नेता फिर से सत्ता की सवारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं इसके लिए आपस में ही युद्ध चल रहा है! और जिन्होंने इस राज्य के लिए लड़ा कुर्बानियों का इतिहास रचा वह अलग थलग पड़े हैं ? जबकि समझने और जागने का समय निकट दिखने लगा है! राज्य बनने से पूर्व जो सपना देखा था वह तो आज भी सपना ही है!
किसी ने प्रसाद के रूप में राज्य नहीं दिया! लोगों ने बलिदान दिया! राज्य आंदोलन में जनता ने करोड़ों करोड़ पुतले पीएम नरसिंहराव के ही फूंके और माया मुलायम का क्या कहना! सब कुछ इतिहास के पन्नों में दर्ज है!
क्या हुआ क्या नहीं ये लिखना उचित नहीं लगता क्योंकि सब इतिहास और गूगल बाबा के पास दर्ज है कुछ छिपा रहस्य भी है जो हम जैसे मित्रों के पास है जो मन मस्तिक में अंकित हैं!
कई जगह तो राज्य बनने के बाद भी सार्वजनिक स्थानों पर पुतले नरसिंहराव और मुलायम के टंगे रहे थे! राज्य की जन भावना को अटल बिहारी बाजपेई ने समझा और अपनी सरकार में नेता विरोधी दल की सरकार के बावजूद पंडित नारायण दत्त तिवारी को विशेष पैकेज देकर इस राज्य की मजबूत बुनियाद रखी थी! लेकिन तब भी यही हाल था लेटर बम चला करते थे ?
आज राज्य में फिर से कांग्रेस चुनाव से पहले ही हारती नजर आती है! सत्ता सुख शांति प्राप्त करने से मिल सकती है! संतोष किए बिना शांति नहीं मिल सकती! संतोष होगा नहीं तो शांति कहां से प्राप्त होगी ? क्योंकि जहां संतोष होगा वहां शांति होगी! शांति होगी नहीं तो सत्ता कैसे हासिल होगी ?
अब कहीं ऐसा न हो कि संघर्ष पूरे राज्य में उक्रांद और भाजपा के बीच सीमित हो! कांग्रेस की जगह उक्रांद राज्य में तेजी से उभरता दिख रहा है जो कांग्रेस की जगह ले सकता है! तीसरा मोर्चा बनाम भाजपा चुनाव हो सकता है!
क्योंकि राज्य आंदोलन तो कांग्रेस शासन की ही उपज है! 1952 में यह राज्य आंदोलन की आवाज उठने लगी थी! तब किसकी सरकार ने दमन किया! उत्तराखंड विकास बोर्ड का एक बड़ा बोर्ड लखनऊ में टंगा हुआ रहता था! भाजपा ने राज्य बनाया था तो विपक्ष क्षेत्रीय दल होना था लेकिन मतदाता के लोभ में सनसनी तौर पर फंस जाने से और जागरूक लोगों के पलायन से कांग्रेस बनाम भाजपा हो गया!
सच कहा जाए तो कर्म फल मिलता है ये प्रमाणित है! कांग्रेस आज सरकार बनाने की स्थिति में लग रही थी कि कांग्रेस में घमासान मच गया है! भाजपा में भी अंदर खाने जो चले लेकिन बाहरी रूप में अभी स्थिरता है!
धामी सरकार पर अब तक जो भरोसा जनता को है वह आगे मतदान में तभी शामिल होगा जब ये बचे हुए समय में धरातल पर कोई पहल से सकारात्मकता की तरफ कारवां बढ़ेगा!
मंत्री कितना विकास धरातल पर उतारने के लिए राज्यभर में काम करते हैं ये उनके काम पर निर्भर करता है!
पीएम नरेंद्र मोदी सरकार और धामी सरकार का ग्राफ कांग्रेस में घमासान से बढ़ रहा है और जनता धर्म की तरफ बढ़ती दिख रही है! क्योंकि मजारों को हटाने से एक बड़ा वर्ग धामी सरकार के साथ खड़ा हो गया है!
ऐसा भी संभव है कि धामी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच ये चुनाव सीमित हो सकता है! उक्रांद को फाइनेंसर मिल जाए तो उक्रांद एक बड़ा इतिहास रचने की तरफ बढ़ सकती है!
युद्ध भाजपा और उक्रांद के बीच हो सकता है! कांग्रेस नेता टिकट के लिए एक दूसरे को नीचा दिखाने का जो कार्य कर रहे हैं वह कांग्रेस को रसातल में पहुंचने का प्रमाण पत्र कह सकते हैं!
जन भावना कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ नजर आ रही हैं लेकिन पुष्कर धामी का खुद पर आत्म विश्वास सरकार की वापसी का राज साबित हो सकता है!
इसका कारण कांग्रेस के वह नेता जो परिवारवाद को जिंदा रखने के लिए कांग्रेस को रसातल में पहुंचने तक नहीं छोड़ते दिखाई दे रहे हैं! वही कांग्रेस के लिए बहुत दिख रहे हैं! धामी सरकार को ज्यादा दिक्कत नहीं होगी!
किस्सा है पिता भी एक उम्र में बच्चों से कहता है कि बेटा अब हम आराम करते हैं! आप सब कुछ समझ कर राजपाठ सम्हाले! लेकिन कांग्रेस में कई महारथी अपने वर्चस्व के लिए अपने ही घर में जाकर अपना बना हुआ भोजन ! ये कहो थाली में परोसा बर्तन उठाकर फेंक देते हैं तब इसे क्या कह सकते हैं आम लोगों की भाषा में ?
रात इतनी पीते हैं कि सुबह तक उतरती नहीं! सिर हल्का करने को फिर सुबह लगा लेते हैं तो फिर कब चढ़ी और कब उतरी का पता कैसे लगेगा!
आज सोशल मीडिया का समय है! गलत जगह और सही जगह का अंदाजा लगना कठिन है! सत्ता सुख के लिए घर में युद्ध पतन का कारण बनना तय है!
ये कहो न ईमान बच सका न राज्य का दर्द दूर हो सका! राज्य उत्तराखंड युवा अवस्था में है जब हर हाथ को काम चाहिए! हर खेत को पानी/बिजली/पुल सड़क और पुनर्वास के लिए भारी संख्या में भवन चाहिए! दरकती पहाड़ी को दर्द की दवा चाहिए़! देव भूमि को धरातल पर विकास चाहिए़!
पलायन राज्य आंदोलन के समाप्त होने, राज्य बनने के बाद रुकना चाहिए था! लेकिन विडंबना और दुखद पहलु देखिए आपदा और बेरोजगारी ने राज्य से पलायन और तेज कर दिया है!
राज्य में आय के सीमित संसाधन हैं! राज्य के बड़े नेता जो गांव में रहकर उनके लिए लड़ने का वचन देकर विधायक या सांसद बने वही जीतकर सबसे पहले पलायन कर गए! इससे लोगों की मानसिकता पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है! हर कोई बच्चों को उच्च शिक्षा देने के लिए पलायन कर रहा है! रोजगार होता तो परिवार पलायन नहीं करता!
शहरी नेता फिर जब अपनी विधानसभा गए तो फिर कहा गांव के लोगों से कि तुमसे तो बदबू आती है इसलिए हम देहरादून और हल्द्वानी रहना पसंद करते हैं! इस चुनाव में क्या जनता उन नेताओं को सबक सिखाएगी जो उनके साथ रहने और उनकी समस्या हल करने के लिए वचन देकर सांसद या विधायक चुने गए?
जो पलायन कर गए उनको जीतने में इस बार बमुश्किल जीत वाली स्थिति का सामना करना पड़ेगा… ? आम लोग हर बात चुनाव में ही कहते हैं! आम मतदाता भी चुनाव में सीएम से कम अपने को नहीं समझता यही लोकतंत्र की पहचान है!
वोट के समय दारू मुर्गा और नोट की लालची निगाह की बीमारी के साथ मतदान करने वाली परिपाटी के चलते नेता पलायन नहीं करेंगे ? नेताओं को पता है चुनाव में गड्डी और हड्डी चाहिए़ चाहे आप कितने ही ईमानदार समाजसेवी हो!
ये किस लोकतंत्र में लिखा है कि मतदाता भ्रष्टाचार में लिप्त होकर मतदान करेगा! गांव में पंचायत होती है छोटे बड़े झगड़े इसमें निपट जाया करते हैं सब एक मुंह होकर पर जब देश में सरकार बनाने के लिए पंचायत होती है!
मतदान होता है तब मतदाता लोभ में आकर अपनी सोच के खिलाफ मतदान कर रहा है तब नेता वह रुपए कहां से लाएगा ? जो उसने चुनाव में बोरियों के हिसाब बांटे! मतदाता जब बेईमान हो तो ईमानदार सरकार की कल्पना कैसे की जा सकती है!
मतदाता जिस दिन अपनी अंतरात्मा की आवाज पर ईमानदारी से मतदान नहीं करते तब तक ईमानदार नेता और सरकार की कल्पना नहीं की जा सकती है! चुनाव को पैसे वाला होली जैसा त्यौहार बना दिया!
उत्तराखंड में चुनाव पूर्व विधायक के दावेदार जुगत में जुट गए हैं! कांग्रेस का घमासान उसे स्वयं हार की तरफ ले जाएगा ये हाल रहा तो इस बार उक्रांद कांग्रेस की जगह सदन में होगा! ऐसा कांग्रेस संदेश भेज रही है जनता में! कांग्रेस को कांग्रेस ही साफ करेगी ऐसा प्रतीत होता है!
जहां जनता में विरोध बढ़ रहा है वहां उक्रांद नेता एक जुट रहे तो युद्ध भाजपा और उक्रांद के बीच सीमित हो जाएगा! युवाओं को नेतृत्व दे कांग्रेस! लेकिन परिवारवाद और कुर्सी जहाज में घूमने का मोह नेताओं को कैसे बेचैन कर रहा है वह तो वही बेहतर बता सकते हैं जो एक दशक से कुर्सी गंवाएं बैठे हैं! कुल मिलाकर कांग्रेस नेता अपनी किस्मत खुद दिवालिया घोषित करने में जुटते प्रतीत होते हैं। प्रधान संपादक जीवन जोशी की कलम से
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