
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन के मामले में आज भी उतना मजबूत नहीं है जितना होना चाहिए! कई झटके झेलने के बाद ही उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन टीम उतनी मजबूत नहीं बन सकी जितनी जरूरत है।
मालपा गांव आज मानचित्र से ही मिट गया लेकिन इसको लेकर कभी भी गंभीर चिंतन की जरूरत महसूस नहीं की गई। लगातार छोटे छोटे झटके उत्तराखंड में भूकंप के आ रहे हैं, भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग लगातार चेतावनी देता रहा है कि उत्तराखंड राज्य को अनियंत्रित विकास से खतरा है।
भूकंप लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है लेकिन इस विषय पर जितना सावधान होना चाहिए उतना जरूरत महसूस नहीं की जा रही है।
तुर्की में आई विनाश लीला से सबक लेकर गंभीर चिंतन शिविर आयोजित किए जाते तो कुछ जागरूकता आती और लोग भविष्य के खतरे के प्रति जागरूक रहते। उत्तराखंड राज्य में गंभीर चिंतन शिविर आयोजित किए जाने चाहिए।
अवैज्ञानिक तरीके से हो रहा विकास उत्तराखंड राज्य के चिंता का कारण तो नहीं बनेगा ? अंधाधुंध खनन भी इसके लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार है! नदियों के कारोबार की आड़ में पहाड़ों की जड़ों को खोद डाला गया है तो कहीं खड़िया खुदान के नाम पर पहाड़ियों के साथ अत्याचार किया जा रहा है जो आपदा को खुला आमंत्रण है!
उत्तराखंड भूकंप के खतरे की जद में तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है जो बेहद चिंता का विषय है। सरकार को चाहिए कि वह आपदा प्रबंधन टीम को मजबूत करे व जनता को भी चाहिए कि वह राज्य को बचाने के लिए प्रकृति से खिलवाड़ बंद करे।
प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने का परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा! जल, जंगल, जमीन से मनुष्य का रिश्ता कमजोर होना भी एक कारण है। आज जरूरत सबकी बढ़ रही है लेकिन जिसकी जरूरत है वह मनुष्य भूलता जा रहा है।
शुद्ध पेयजल सबको चाहिए, शुद्ध हवा सबको चाहिए लेकिन इसके बावजूद कोई जल, जंगल, जमीन से प्यार नहीं करता। जरूरत तो है लेकिन उत्पादन कोई नहीं करना चाहता जिससे प्रकृति ने भी अपना व्यवहार मनुष्य की भांति बदलना शुरू कर दिया है।















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