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*ब्रेकिंग न्यूज*पंडित नारायण दत्त तिवारी की वह बात आज लगने लगी प्रासंगिक! पढ़ें प्रधान संपादक *जीवन जोशी* की अपनी बात*…

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उत्तराखंड। प्रधान संपादक *जीवन जोशी* की अपनी बात विकास पुरुष के नाम से अपने दौर में प्रचलित नाम था पंडित नारायण दत्त तिवारी! आज पंडित नारायण दत्त तिवारी इस दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनकी कही बातें आज के वर्तमान समय में प्रासंगिक लगती हैं!

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पंडित नारायण दत्त तिवारी ने शुरुआती दौर में पृथक राज्य उत्तराखंड का जमकर विरोध किया था और यहां तक कह दिया था कि अगर उत्तराखंड बना तो मेरी लाश पर बनेगा! लेकिन उस दौर में उनके बयान का विरोध हुआ, लोगों में 1952 में पीसी जोशी द्वारा रखी गई पृथक राज्य की अवधारणा वाली तस्वीर घर कर गई थी जिससे लोगों ने इस मांग का विरोध करना शुरु कर दिया जिससे सभी राजनीतिक दल बैक फुट पर आ गए और सबकी मजबूरी बन गई पृथक राज्य उत्तराखंड का समर्थन करना ?

पंडित नारायण दत्त तिवारी अंत तक पृथक राज्य उत्तराखंड के बदले केंद्र शासित प्रदेश के पक्षधर थे लेकिन जन दबाव के आगे सबको नतमस्तक होना पड़ा और मजेदार बात देखिए जब पृथक राज्य बना तो सबसे पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री जो पांच साल रहे वह नाम पंडित नारायण दत्त तिवारी हैं!

पृथक राज्य न बनने का कारण वह जो जानते होंगे या जो उनकी सोच होगी उसका परिणाम सामने है! जो काम करता है उसे काम नहीं करने देते! हर दल का नेता अपने ही नेता की टांग यहां खींचता है! एक दूसरे को नंगा करने वाली सियासत यहां जन्म लेकर जवानी का लुत्फ उठा रही है!

पहले अखबार वाले खबर रोक देते थे समस्या थी! आज तो जेब में फोन होना चाहिए लिख दो कुछ भी! बोल दो कुछ भी! इसका जनता में क्या संदेश जाएगा! लोग क्या सोचते होंगे कोई चिंतन करता है! पैसा कमाना सियासत का पहला कर्तव्य लगने लगा है! एक दूसरे पर आरोप पैसे को लेकर! विकास की बात कहां हो रही है!

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इससे इतने लिए उसको इतने दिए! वह भी करोड़ों में! अरे बेशर्म नेताओं जनता क्या सोचती थी और क्या तुम कर रहे हो सोचना कभी भगवान के मंदिर में बैठकर जब आँखें बंद हों तब सोचना जनता के सपने साकार हो रहे हैं या नेताओं के सपने साकार हो रहे हैं!

माफिया लॉबी ने दोनों ही दलों के नेताओं और अधिकारियों को कैसे डील करना है यह सीख लिया है! नेता एक दूसरे की टांग देहरादून में खींचे तो बात समझ में आती है लेकिन जब घर की बात दिल्ली में जाकर होती है तो क्या ये नेता राष्ट्रीय राजनीति में उपहास के पात्र भर नहीं रह जाते ? क्या केंद्र में इस तरह जगह कभी बना सकते हो जैसे पंडित नारायण दत्त तिवारी, गोविंद बल्लभ पंत , बहुगुणा जी जैसे लोग बना गए! के सी पंत के बाद कोई नेता केंद्र तक बात नहीं बना सका! इसी खींचतान ने अजय भट्ट को केंद्र से पैदल किया, इसी के चलते भगत सिंह कोश्यारी हल्द्वानी आराम फरमा रहे हैं तो वहीं हरीश रावत जैसे धुरंधर काफल पार्टी कर रहे हैं! उत्तराखंड के नेताओं को कैसे समझाया जाए!

दल बदल करने वाले नेताओं ने भी उत्तराखंड में भ्रष्टाचार को मजबूती प्रदान की है! सरकार बनाने के लिए करोड़ों में एक नहीं दो बार विधायक खरीदे गए जब कांग्रेस की सरकार थी!

पंडित नारायण दत्त तिवारी जानते थे उत्तराखंड का स्वभाव और आदत! जो आज राजनीति में हो रहा है या दिख रहा है वह पंडित नारायण दत्त तिवारी पूर्व में ही जानते थे कि यहां ऐसा ही होगा! लोग टांग खींचने की बीमारी से ग्रसित हैं!

प्रधानमंत्री भाजपा के अटल बिहारी बाजपेई थे और दूसरी ओर सरकार कांग्रेस की उत्तराखंड में थी जिसके सीएम पंडित नारायण दत्त तिवारी थे! पंडित नारायण दत्त तिवारी के आग्रह पर विशेष बजट इस राज्य को दिया गया! क्या आज ऐसा होता तो इतना संभव था! सिडकुल बना और न जाने कई बड़े काम हुए!

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आज लड़ने में लगे हैं जब सत्ता के लिए संगठन में ही संघर्ष होगा और पार्टी के लोग ही मुखिया की टांग खींच रहे हैं तो राजनीति का स्तर क्या समझा जाए! इस राज्य में जिसने भी अच्छा काम किया उसे लोगों ने और संगठन की तिकड़ी टीम ने अस्वीकार किया है!

भुवन चंद्र खंडूड़ी इसका प्रमाण हैं! उनको पुनः सीएम न बने करके , उनके ही अपने लोगों ने हरवाया! सीएम पुष्कर धामी सरकार में सीएम रहते हुए अपने गृह क्षेत्र से हारते हैं तो क्या इसका अर्थ लगाया जाएगा!

वर्तमान में भी कुछ ऐसा ही चल रहा है! कांग्रेस और भाजपा दोनों एक जैसे नजर आने लगे हैं! भाजपा का वह अनुशासन अब नहीं दिखता जब विधायक, सांसद सब कार्यकर्ता के साथ दरी पर बैठा करते थे!

उत्तराखंड क्रांति दल की बात करें तो उसके पास कार्यकर्ता हैं लेकिन गरीबी के कारण उसका प्रचार तक नहीं हो पाया! जो उनके विधायक जीते वह भी संगठन खड़ा नहीं कर सके! सांगठनिक ढांचा मजबूत जिसका होगा वही स्थायित्व पा सकता है।

उत्तराखंड का दर्द जिसके सीने में आज भी धधकता है वह इस पीड़ा में है कि क्या सोचकर राज्य बनाया था और क्या हो रहा है! राज्य के लिए जो सीएम सही कर रहा है उसकी टांग खींच रहे लोगों ने ही इस राज्य को कर्ज में डुबोया है। हर सीएम को पांच साल सरकार चलाने का जनादेश आधे में क्यों वापस लिया जाता है?

जनता के जनादेश से बड़ा जब नेताओं का जनादेश होने लगे, मुखबिरी राजनीति में जगह बनाने लगे तब फिर पंडित नारायण दत्त तिवारी की बातें प्रासंगिक लगने लगती हैं। अब सीएम पुष्कर धामी के खिलाफ जबरदस्त तरीके से मुहिम शुरू कर रहे हैं उनके ही कुछ लोग! दिल्ली में उत्तराखंड के फैसले दिल्ली वाले लें तो समझ आता है लेकिन जब उत्तराखंड के नेता उत्तराखंड के फैसले दिल्ली में बैठकर करें तो बात हजम नहीं होती!

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