

उत्तराखंड में नंदाष्टमी का बड़ा महत्व है! इस अवसर पर जगह जगह मेलों का आयोजन किया जाता है और भक्त मां नंदा की आराधना करने का हर साल नंदाष्टमी मेले का इंतजार करते हैं! इस मेले के आयोजन से पूर्व हर उस मंदिर से जहां मेले आयोजित होते हैं वहां से ब्रह्म कमल लेने लोग हिमालय जाते हैं या उसकी तलहटी जहां पुष्प उपलब्ध हों वहां से डंगरियों के साथ भक्त ब्रह्म कमल लेकर आते हैं जिसे पृथ्वी से ऊपर उठाकर ही मंदिर तक लाने की परम्परा है।
इसके बाद जब ब्रह्म कमल लेकर लोग अपने मंदिर पहुंचते हैं तो मंदिर में पहले से मौजूद लोगों द्वारा उनका बाह्य यंत्रों से स्वागत होता है और उसके बाद सातू आठों (नंदाष्टमी)मेले का शुभारंभ होता है! ब्रह्म कमल जब देवताओं को अर्पित किए जाते हैं तब जागर प्रारंभ होती है और पूरी रात मां नंदा अपना आशीर्वाद अपने भक्तों को देकर नवमी की सुबह प्रस्थान कर जाती है!
इसके बाद पूजा और भंडारा होता है। इस मेले के लिए लोग इंतजार करते हैं क्योंकि इन मेलों में सालों के बिछड़े दोस्त, मित्र मिलते हैं! उत्तराखंड के इन मेलों में महिलाओं की भागीदारी चारचांद लगाने का काम किया करती हैं!
उत्तराखंड की संस्कृति को बचाने में इन मेलों का विशेष महत्व है! सरकार इन मेलों का संरक्षण करे जिससे परम्परा और संस्कृति को जीवंत रखा जा सके।
लेखक: प्रधान संपादक जीवन जोशी


























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