

उत्तराखंड ने इस देश को एक से बढ़कर एक प्रतिभा दी हैं। चाहे सुमित्रा नंदन पंत हों, गोविंद बल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा, गोवर्धन तिवारी, इंद्रमणि बड़ौनी, सोबन सिंह जीना, चंडी प्रसाद भट्ट, रामदत्त जोशी अनगिनत प्रतिभाएं इस देव भूमि में जन्मी हैं।
इन प्रतिभाओं में एक पण्डित नारायण दत्त तिवारी भी हैं जो 18 अक्टूबर को अवतरित हुए और 18 अक्टूबर को ही दुनियां से चले गए!
मटियाल गांव भीमताल में जन्मे पंडित नारायण दत्त तिवारी ने आजादी के आंदोलन से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा! पूरा जीवन राजनीति में व्यतीत किया। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने विकास को महत्व दिया जिसके क्रम में उन्होंने उद्योगों को बढ़ावा दिया जो आज भी नजर आते हैं।
पंडित नारायण दत्त तिवारी का उनकी जयंती पर स्मरण किया जा रहा है उनके अनुयायी उनको याद कर रहे हैं और उनके कार्यकाल पर चर्चा कर रहे हैं! तब चर्चा ये भी होनी चाहिए जो लोग आज उनके नाम पर राजनीतिक रोटी सेक रहे हैं वह तब पंडित नारायण दत्त तिवारी के कितने हितैषी थे ?
जब वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे तब की बात करें: स्व. तिवारी जी के सामने दोहरी चुनौती थी! एक तरफ दिल्ली से लेकर देहरादून तक कांग्रेस के भीतर ही उनके विरोधी उनकी कुर्सी खींचने में लगे थे, दूसरी तरफ एक नवजात राज्य, जिसके पास न बजट था, न इंफ्रास्ट्रक्चर, न दिशा। विरोधी कुर्सी गिराने का षड्यंत्र रचते रहे, और तिवारी जी कुर्सी बचाते-बचाते राज्य को बना गए। यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी कला थी। जो उनकी सबसे बड़ी सफलता कही जा सकती है।
1. सिडकुल क्रांति: 2002 से पहले रुद्रपुर, पंतनगर, सितारगंज सिर्फ नाम थे। तिवारी जी टाटा, बजाज, अशोक लेलैंड, महिंद्रा जैसे सैकड़ों उद्योगपतियों का आगमन
2. शिक्षा का विस्तार: दून विश्वविद्यालय, उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय, हर जिले में पॉलिटेक्निक – यह सब 2002-2007 के विजन का परिणाम है।
3. स्वास्थ्य: हल्द्वानी का डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल और दून अस्पताल की क्षमता तिवारी जी ने ही बढ़ाई।
4. नगर निगमों की नींव: हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार आदि का शहरीकरण की मुख्यधारा में लाने की सोच उन्होंने ही दी।
आज राजनीतिक दलों को चाहिए कि अच्छे गुणों को अंगीकार करें और गलत आचरण का परित्याग किया जाए! वह राजनीति इस राज्य में हो जो देव भूमि में होनी चाहिए क्योंकि देव भूमि में त्याग और तपस्या की जरूरत है! सबकुछ यहीं है सिर्फ सोच सही है तो इस राज्य को दुनियां के सबसे धनी प्रदेश बनाया जा सकता है इतनी संभावना पर्यटन के क्षेत्र में दिखाई पड़ती हैं!
तिवारी जी की खूबी थी वह अपने ही पार्टी के विरोधियों से लड़कर भी विकास करते रहे। आज उनको याद करने का मतलब त्याग और समर्पण को अंगीकार करना होना चाहिए। उनके अच्छे गुणों को अंगीकार कर इस युवा राज्य को बेहतर राज्य बनाने की दिशा में सबको सामूहिक प्रयास करना होगा, यही पंडित नारायण दत्त तिवारी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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