Durgami Nayan

Latest Uttarakhand News in Hindi

ADVERTISEMENTS Ad

ब्रेकिंग न्यूज: *सरकारें आएंगी~जाएंगी, लेकिन राष्ट्र सुधारों में कोई विलम्ब न हो यही लोकतंत्र है*! पढ़ें : *स्वतंत्रता दिवस* पर विशेष…

Ad
खबर शेयर करें 👉
Oplus_131072

हमारे देश भारत को ब्रिटिश दास्ताँ से मुक्त हुए उन्यासी वर्ष बीत चुके हैं। इन उन्यासी सालों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र के मूल मूल्यों पर कितनी खरी उतर रही है तथा स्वतंत्रता, समानता और न्याय के बुनियादी सिद्धांत क्या आम आदमी के प्रति निष्पक्ष रूप से लागू हैं अथवा उस पर भी अवसरवादी व अलगाववादी जातीय राजनीति का कुत्सित चेहरा प्रभावी है! चिंतनीय और सोचनीय है…

ADVERTISEMENTS

यह गंभीर चिंतन का विषय है… कौन नहीं जानता, कि किसी भी राष्ट्र के समग्र एवं चहुंमुखी विकास के लिए वहां के सभी नागरिकों का राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होना पहली अनिवार्यता होती है। यह भी आवश्यक होता है, कि प्रत्येक नागरिक जाति, धर्म, संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पित रहे तथा व्यक्तिगत स्वार्थ को नकार कर राष्ट्र को सर्वोपरि मानें।

उल्लेखनीय है स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने भले ही भौतिक संसाधनों में चाहे जितनी वृद्धि की हो, मगर कुछ समस्याएं दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ी हैं, जिन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति भयावह होगी!

कहीं कहीं राजनीतिक कारणों से समस्याओं को नजरअंदाज किया गया, जिस कारण समस्याएँ विकराल होती गई। कौन नहीं जानता कि देश में अधिकांश समस्याओं की जड़ बढ़ती जनसंख्या है, जिस पर अंकुश न लगाए जाने से स्थिति विस्फोटक हो चुकी है।

महंगाई और बेरोज़गारी इसी के चलते बढ़ रही है। वस्तुस्थिति यह है कि सीमित संसाधनों के चलते हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी जैसी मूलभूत सुविधाओं को व्यवस्थित करना कठिन हो गया है। यही नहीं, सीमान्त प्रदेशों में विदेशी घुसपैठियों की सटीक पहचान न होने से घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं, तिस पर सत्ता सुख के लिए राजनीतिक दलों द्वारा माल ए मुफ्त दिल ए बेरहम जैसी नीतियां अपनाकर मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से देश में ऐसी जमात खड़ी हो गई है, जो मुफ्त का माल खाकर भी देश की सगी नहीं है।

यह भी पढ़ें 👉  ब्रेकिंग न्यूज: *रक्षा बंधन से पूर्व खाद्य विभाग की छापेमारी*! पढ़ें रामनगर अपडेट...

यूँ तो सत्ता पर नकेल कसकर निरंकुश सत्ता को सचेत करना स्वस्थ विपक्ष का दायित्व होता है, लेकिन सिर्फ़ विरोध के लिए विरोध करके कल्याणकारी योजनाओं में अवरोध उत्पन्न करना किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता।

देश का दुर्भाग्य है, कि किसी भी समस्या के निपटने के बाद भी समस्या को मुद्दा बनाकर अराजकता उत्पन्न करना ही कुछ लोगों का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। ऐसे में सही को सही कहने का साहस भी कोई नहीं जुटा पा रहा है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लील गालियाँ और अभद्र भाषा का प्रयोग देश की स्वाधीनता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। ताज्जुब तब होता है, जब राजनीति करने वाले तथाकथित नेता गाली बाजों के समर्थन में खड़े होकर अश्लील कृत्यों की पीठ थपथपाने में शर्म महसूस नहीं करते।

देश में बरसों से राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने और सभी के साथ समान न्याय हेतु समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की बात की जा रही है, किन्तु समान नागरिक संहिता का नाम सुनते ही कथित साम्प्रदायिक शक्तियां विरोध करने पर उतारू हो जाती हैं। जैसे उन्हें औरों से अधिक सुविधाएँ व अधिकार मिलें, कुछ राजनीतिक दलों को लगता है, कि यदि समान नागरिक संहिता लागू हो गई तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।

इसी प्रकार जनसँख्या नियंत्रण की चर्चा करते ही कुछ धर्मगुरुओं की धार्मिक आस्थाएं आहत होने लगती हैं, जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को वह प्रकृति के विरुद्ध सिद्ध करने लगते हैं। जिस कारण राष्ट्र के कर्णधार कठोर निर्णय लेने की अपेक्षा अपने कदम पीछे हटाने के लिए विवश होते हैं तथा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार योजनाबद्ध ढंग से नहीं हो पाता।

यह भी पढ़ें 👉  ब्रेकिंग न्यूज़: *श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की तैयारी शुरु*! पढ़ें लालकुआं विधानसभा क्षेत्र अपडेट...

पुरानी कहावत है कि विदेशी या प्रत्यक्ष दुश्मन से लड़ना आसान होता है, किंतु अपने ही घर में यदि दुश्मनों के प्रतिनिधि बैठे हों, तो उनसे लड़ना सरल नहीं होता। आज देश ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है।

देश को अस्थिर करने हेतु षड्यंत्रकारी शक्तियाँ अपने अपने मोहरों के साथ सड़कों पर हैं, इधर युवा शक्ति रोजगार के लिए पेपर लीक मामले पर राजनीतिक दलों के लिए आईना साबित हो रही है!

सड़क से लेकर संसद तक नकारात्मक दृष्टिकोण राष्ट्र को पीछे धकेलने का प्रयास कर रहा है। जनता के सामने राजनीतिक दल अपनी खोई हुई धरती तलाशने के लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार तार कर रहे हैं। ऐसे में आवश्यक है, कि स्वाधीनता दिवस को मंथन दिवस मानकर विश्लेषण किया जाय कि भारत ने विगत उन्यासी सालों में कितनी प्रगति की तथा किन मोर्चों पर भारत फेल हुआ।

केवल पक्ष और विपक्ष की लड़ाई में भारत किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं होना चाहिए। सरकारें आएँगी जाएंगी, लेकिन राष्ट्र सुधारों में कोई विलम्ब नहीं होना चाहिए।

समान नागरिक संहिता, आरक्षण विहीन सामाजिक व शैक्षिक व्यवस्था, कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति आज की प्राथमिकताओं में सर्वोपरि होनी चाहिए, ताकि स्वतंत्र भारत वास्तव में स्वस्थ लोकतंत्र का प्रहरी बना रहे। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप राष्ट्र निर्माण को चुनौती के रूप में स्वीकार करके आगे बढ़ना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है। भारतीय जनता को स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे के इतिहास पर चिंतन करना होगा जिससे भारतीय लोकतंत्र जीवंत रह सके।: सहयोग विनायक फीचर्स

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad

लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -

👉 हमारे व्हाट्सऐप ग्रुप से जुड़ें

👉 फ़ेसबुक पेज लाइक/फॉलो करें

👉 यूट्यूब चैनल सबस्क्राइब करें

👉 न्यूज अपडेट पाने के लिए 8218146590, 9758935377 को अपने व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ें