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ब्रेकिंग न्यूज़: *बांग्लादेश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि वो पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने के बाद भी चैन की सांस नहीं ले सका*! पढ़ें *दीपू की हत्या से क्या उठे सवाल*…

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गत जुलाई में बाग्लादेश की तत्कालीन शेख हसीना सरकार को जिस तरह पाकिस्तान की शह पर कट्टरपंथियों द्वारा उखाड़ फेंका गया और उनके घर को जलाकर खाक कर दिया गया, तब यदि वे भागकर भारत में शरण न लेतीं तो उनकी हत्या तय थी।

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पाकिस्तान के इशारे पर शेख हसीना का तख्ता पलटने में मुख्य भूमिका निभाने वाले शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद भड़की हिंसा में एक झूठी कहानी गढ़ी गई और ईश निंदा के झूठे आरोप पर कट्टरपंथियों ने एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वाले निर्दोष दीपू चन्द्र दास को पीट-पीटकर मरणासन्न करने के बाद उसे जलाकर मौत के घाट उतार दिया। इस घटना से बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं में भारी रोष के साथ भय व्याप्त है।

फिलहाल भारत सरकार की ओर से इस दुर्दांत घटना पर अपना विरोध जताने के साथ चेतावनी भी दे दी गई है किन्तु जब तक बंगलादेश के विरुद्ध कड़े कदम नहीं उठाए जाएंगे तब तक बांग्लादेश पटरी पर आने वाला नहीं है। दीपू की निर्मम हत्या से भारी रोष देखने को मिल रहा है।

सभी का एक ही मत है कि जल्द से जल्द पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश के विरूद्ध निर्णायक कार्यवाही की जाए और पाकिस्तान को भी पुन: करारा सबक सिखाये ताकि वो बांग्लादेश में अपनी जड़ें न जमा सके।

यह बांग्लादेश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि वो पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने के बाद भी चैन की सांस नहीं ले सका है।

उम्मीद थी कि शेख हसीना के नेतृत्व में जिस तरह बांग्लादेश प्रगति के मार्ग पर बढ़ रहा है एक दिन निश्चित ही वो विकासशील देशों की पंक्ति में आ खड़ा होगा पर शायद पाकिस्तान की आंखों का कांटा बने बांग्लादेश के कट्टरपंथियों को भी यह मंजूर नहीं था।

शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद से जिस तरह बांग्लादेश दिनों दिन गर्त में डूब रहा है उससे साफ है कि बांग्लादेश देश पूरी तरह पाकिस्तान के जाल में फंस चुका है।

कंगाल पाकिस्तान कतई नहीं चाहता कि आइंदा भारत की छाया में बांग्लादेश फलफूल सके। पाकिस्तान के इस षड़यंत्र में चीन का शामिल होना आश्चर्य की बात नहीं है।

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पहले शेख हसीना की सरकार को अपदस्थ करना फिर खासकर हिन्दुओं को लगातार प्रताड़ित करना एक प्रकार से भारत को चुनौती देना पाकिस्तान, चीन की मिली भगत का ही प्रमाण है।

स्मरण रहे बांग्लादेश का अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस पाक-चीन की गोद में खेल रहा है।

अव्वल तो वो किसी भी हाल में बांग्लादेश में चुनाव नहीं चाहता और यदि चुनाव होने की बाध्यता आ जाये तो किसी भी सूरत में शेख हसीना की पार्टी को भाग लेने नहीं देगा। इसकी कवायद शुरू भी हो गई है।

पहले शेख हसीना को फांसी की सजा देने का अदालत का निर्णय फिर येन-केन-प्रकारेण उनकी पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की घोषणा से साफ है कि बांग्लादेश बुरी तरह पाकिस्तान-चीन के जाल में फंस चुका है।

यह भी कि पाकिस्तान कतई नहीं चाहेेगा कि चुनाव बाद बांग्लादेश में स्थिरता आये।

ऐसे में यदि चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बीएनपी, कट्टरपंथी, जमात-ए-इस्लामी और आंदोलनकारी छात्रों की पार्टी एन.सी.पी. के बीच होता है तो पाकिस्तान यही चाहेगा कि उसकी कठपुतली पार्टी जमात-ए-इस्लामी ही सत्ता में आये ताकि वो बांग्लादेश में अपना हस्तक्षेप जारी रख सके।

यह भी योजना है कि यदि जमात-ए-इस्लामी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो एनसीपी से सहयोग दिलाकर सरकार बनवा दी जाये।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार यदि ऐसा होता है तो फिर बांग्लादेश का गर्त में डूबना तय है। हो सकता है कि मौका देखकर पाकिस्तानी हुक्मरान चीन के बल पर बांग्लादेश पर आधिपत्य जताने का खेल शुरू कर दें। भारतीयों को इजराइली बनना होगा।

हमें महज सवा करोड़ जनसंख्या वाले इजराइल से सबक लेना होगा जो अपनी सुरक्षा और सम्प्रभुता से जरा भी समझौता नहीं करता।

17 करोड़ जनसंख्या वाले चार कट्टर विरोधी मुस्लिम देशों से घिरा और 56 मुस्लिम देशों के निशाने पर रहने वाला इजराइल यदि अपनी संप्रभुता और सुरक्षा को अर्से से बचाये हुये है तो यह उसके सवा करोड़ लोगों की एक जुटता व ताकत से ही संभव हो सका है।

किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि वहां हर इजराइली युवक और युवती को एक निर्धारित समय के लिये सेना में भर्ती होकर राष्ट्र रक्षा के लिये संकल्प लेना होता है। सेना में भर्ती होकर अपने राष्ट्र की रक्षा में भागीदार बनने की उनकी ललक और जज्बा देखते ही बनता है।

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युद्ध के समय जरूरत पड़ने पर ये सैन्य प्रशिक्षित युवक और युवतियां दुश्मन से मोर्चा लेने में जरा भी झिझक नहींं दिखाती क्योंकि उनके लिये राष्ट्र ही प्रथम है।

यहां ये भी गौरतलब है कि इजराइल में भी कोई एक राजनीतिक दल नहीं है। वहां भी दर्जनभर राजनीतिक दल हैं।

सत्ता के लिये उनमें भी कांटे की टक्कर होती है पर जब भी राष्ट्र पर कोई आंच आती है तो सभी दल एक जुट हो जाते हैं। दुर्भाग्य से भारत में ऐसा नहीं है।

कभी-कभी तो देश के कुछ राजनीतिक दल महज अपने राजनीतिक स्वार्थ हेतु देश की साख को भी दांव पर लगाने में चूक नहीं करते।

ऐसे में सत्तारूढ़ सरकार से कहीं ज्यादा देशवासियों की जिम्मेदारी है। जिस दिन देशवासी ‘राष्ट्र प्रथम’ को वरीयता देने लगेगें उसी दिन भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र और ‘विश्व गुरू’ बन जायेगा।

देश के हर नागरिक को दृढ़ सकल्प लेना ही होगा कि भविष्य में वो उसी राजनीतिक दल का चुनाव में समर्थन करेगा जो राष्ट्रहित को प्राथमिकता देगा। कहां है देश की सेकुलर जमात ?

दीपू की निर्मम हत्या के बाद जिस तरह देश की सेकुलर जमात ने मुंह सिल लिया है और आंखों पर पट्टी बांध ली है उससे भारतवासियों की आंखे खुल जानी चाहिये।

यदि अब भी राष्ट्रवादी भारतवासियों ने दिग्विजय सिंह सरीखी सेकुलर जमात को सबक न सिखाया तो कल भारत में क्या होगा सहज कल्पना की जा सकती है।

राष्ट्रवादी भारतवासियों को उन सभी कथित सेकुलर दलों को भी करारा सबक सिखाना ही होगा जो सत्ता की खातिर देश की साख को भी दांव पर लगाने में गुरेज नहीं करते।

यदि आज पश्चिम बंगाल बांग्लादेश की राह पर चल पड़ा है तो इसके लिये वहां की ममता सरकार जिम्मेदार है।

ममता सरकार की तुष्टीकरण की नीति ने न केवल पश्चिम बंगाल की डेमोग्राफी बदल डाली है वरन् हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

ऐसे में आसन्न विधान सभा चुनाव में बंगला देश की क्रूर और पाशविक हिंसा का असर पड़ना तय है। सहयोग:विनायक फीचर्स

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