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सच को छिपाना हो सकता है खतरनाक साबित! पढ़ें डोल रही धरती को लेकर संपादक की अपनी बात…

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नैनीताल। सच को छिपाए रखना और बचाव कार्य में ध्यान न देना खतरनाक साबित हो सकता है! बात करते है हाल के दिनों में लगातार बढ़ रही भूकंप की घटना को लेकर!

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लगातार झटके लग रहे हैं इसके लिए तत्काल प्रभाव से जिस तरह पहल शुरु होनी चाहिए वह नजर नहीं आती! जरूरत है धरती की हलचल पर गंभीर चिंतन किया जाए और उसके कारणों पर मनन हो!

आज सरकार सब कुछ कर रही है इसमें दो राय नहीं है लेकिन जिस तरह लगातार धरती डोल रही है उसके अनुपात में चिंतन नहीं किया जा रहा है जो चिंता का विषय है!

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भूगर्भीय हलचल की तेज रफ्तार से जांच हो और बचाव के तरीके निकाले जाएंगे तभी खुशहाली की कामना की जा सकती है!

हाल के दिनों में नेपाल की घटना से सबक लेकर चलना होगा! किन परिस्थितियों में जनता बच सकेगी ये तरीके इजाद करने होंगे!

लगातार बन रहे कंक्रीट के जंगल कम होने की जगह बढ़ने ही हैं! आबादी के अनुसार कंक्रीट के जंगल नहीं बल्कि कारोबारी तंत्र से कंक्रीट के जंगल बढ़ने ही हैं!

जब कंक्रीट के जंगल बढ़ने लगें और प्राकृतिक जंगल कम होने लगें तो क्या समझा जा सकता है ? मानव स्वभाव ने ही आपदाओं को आमंत्रण न दिया होता तो आज हालत ये न होती!

चिपको आंदोलन से प्रेरणा स्रोत ज्ञान मिला था लेकिन उस समय उस आंदोलन को कुचलने के लिए कुछ तथा कथित लोगों ने जान लगा दी थी!

आज जरूरत है प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की और धरती के दर्द को समझने की! इंसान ही प्रकृति का रक्षक है और वही भक्षक बन गया है तब क्या उम्मीद जताई जायेगी!

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पहले लोग पेड़ो से प्यार करते थे उनको बचाने के लिए प्रयत्न करते थे! आज दिखावे के लिए पेड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है! हर साल पेड़ लगते हैं लेकिन कितने जिंदा बचे इसकी चिंता किसी ने नहीं की!

जब से सोशल मीडिया आया है पेड़ लगते हैं फिर नहीं दिखते! फोन में फोटो अपलोड हो गई तो पेड़ लग गए समझो! आज समय की मांग है कि धरती को लेकर देश भर में बहस शुरू हो जिससे धरती के दर्द को समझा जा सके!

देश में बदल रहे जल वायु परिवर्तन का असर तेजी के साथ देखने को मिल रहा है इसलिए समय रहते समय की नजाकत को समझना ही होगा।

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