
इतिहास का एक विचित्र दृश्य बार-बार सामने आता है। जब किसी समाज को किसी विचार से असहमति होती है, तब वह पहले उसके तर्कों का उत्तर नहीं देता, बल्कि किसी समय स्थापित की गई प्रतिमाएं गिराने लगता है। पत्थर टूटते हैं, कांस्य बिखरता है, नामपट्टिकाएँ उखाड़ दी जाती हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या विचार भी हथौड़े की चोट से टूट जाते हैं?
सन् 2003 में बगदाद में सद्दाम हुसैन की विशाल प्रतिमा गिराई गई। वह केवल एक शासक की मूर्ति नहीं थी, एक युग के अंत का प्रतीक भी थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और पूर्वी यूरोप के अनेक देशों में लेनिन की हजारों प्रतिमाएँ हटाई गईं। यूक्रेन में तो इस अभियान को “लेनिनोपाद” कहा गया।
अमेरिका और यूरोप में दासप्रथा तथा उपनिवेशवाद से जुड़े अनेक व्यक्तियों, एडवर्ड कॉल्स्टन, क्रिस्टोफर कोलंबस और अन्य अनेकों विभूतियों की मूर्तियाँ भी विरोध का प्रतीक बन गईं। अफ़ग़ानिस्तान में बामियान के बुद्ध को विस्फोट से उड़ाया गया। वहाँ उद्देश्य केवल मूर्ति नष्ट करना नहीं था, बल्कि स्मृति, संस्कृति और सहिष्णुता पर प्रहार करना था।
इतिहास बताता है कि प्रतिमाएँ दो कारणों से गिराई जाती हैं। कभी अत्याचार के विरुद्ध जनक्रोध उन्हें हटाता है। कभी असहिष्णुता उन्हें तोड़ती है। दोनों में अंतर है। पहला इतिहास का पुनर्मूल्यांकन है, दूसरा वर्तमान को इतिहास से भय।
भारतीय परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति यह रही है कि यहाँ विचारों का उत्तर विचारों से देने की संस्कृति विकसित हुई। उपनिषदों में प्रश्न हैं। बुद्ध संवाद करते हैं। शंकराचार्य शास्त्रार्थ करते हैं। कबीर चुनौती देते हैं। तुलसी, सूर, मीरा, नानक, महावीर, सबने मतभेद रखे, पर विचार को विचार से काटा।
यही भारतीयता का प्राण है।
दुर्भाग्य से आज का सार्वजनिक जीवन इस परंपरा से दूर जाता दिखाई देता है। बुद्धिजीवियों की स्वतंत्र विचारधारा अतिवादियों को फूटी आँख नहीं सुहाती। असहमति अब विमर्श का विषय कम और वैमनस्य का कारण अधिक बनने लगी है।
लोग बहुत जल्दी आहत होने लगे हैं। समाज में संवाद की जगह शोर, तर्क की जगह हूटिंग और बहस की जगह बहिष्कार का चलन बढ़ रहा है।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा तोड़े जाने की घटना हो या कवि धूमिल (सुदामा पांडे) की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किया जाना, ये केवल मूर्तियों पर हमले नहीं हैं। यह उस मानसिकता का परिचय है जो प्रश्न पूछने वालों से भय खाती है। अंधकार का सबसे बड़ा शत्रु दीपक नहीं, बल्कि वह मनुष्य होता है जो दीप जलाने का साहस करता है।
ताज़ा प्रसंग भी चिंताजनक है। लगभग उन्नीस वर्षों बाद कोलकाता लौटीं चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन के सम्मान समारोह में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि जॉय गोस्वामी दर्शकों में उपस्थित थे। तस्लीमा ने उन्हें मंच पर आमंत्रित किया, किंतु कुछ लोगों की हूटिंग के कारण उन्हें मंच से उतरना पड़ा। यह दृश्य किसी एक व्यक्ति का नहीं, हमारी सांस्कृतिक परिपक्वता का परीक्षण था, जिसमें हम सफल नहीं हो सके।
ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं रहीं। कथाकार मनोज रूपड़ा को भी विरोध के कारण सभागार छोड़ना पड़ा। 2019 के अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन में वरिष्ठ लेखिका नयनतारा सहगल का आमंत्रण वापस लेने का विवाद राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना।
तमिल के प्रसिद्ध लेखक पेरूमल मुरुगन को सामाजिक दबाव और विरोध इतना असहनीय लगा कि उन्होंने निराश होकर घोषणा कर दी, “लेखक मुरुगन मर चुका है।” बाद में न्यायपालिका के हस्तक्षेप और साहित्यिक समाज के समर्थन से उनका लेखकीय पुनर्जन्म हुआ, पर यह प्रसंग भारतीय लोकतंत्र के माथे पर आज भी प्रश्नचिह्न बना हुआ है।
भारतीय साहित्य का इतिहास असहमति की स्वीकृति का इतिहास है। प्रेमचंद ने रूढ़ियों पर प्रहार किया। निराला ने परंपरा को चुनौती दी। मुक्तिबोध ने व्यवस्था से प्रश्न किए। धूमिल ने लोकतंत्र की भाषा को कठघरे में खड़ा किया। राहुल सांकृत्यायन ने वैचारिक यात्राओं से स्थापित धारणाओं को झकझोरा। यदि ये सब केवल प्रशंसा के गीत लिखते, तो शायद विवादों से बच जाते किंतु तब वे साहित्यकार भी न होते।
वस्तुतः साहित्य का काम सुविधा देना नहीं, संवेदना जगाना है। वह मनुष्य को बेचैन करता है। जो रचना हमें सोचने पर विवश न करे, वह मनोरंजन तो हो सकती है, साहित्य नहीं।
सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब समाज लेखक से यह अपेक्षा करने लगे कि वह केवल वही लिखे जो बहुसंख्यक सुनना चाहते हैं।
लेखक का धर्म लोकप्रिय होना नहीं, प्रामाणिक होना है। वह सत्ता का भी प्रश्नकर्ता है और समाज का भी। उसकी कलम किसी दल की सदस्य नहीं होती, वह केवल सत्य की नागरिक होती है।
यह भी स्मरण रखना चाहिए कि किसी लेखक से असहमति होना पूर्णतः स्वाभाविक है। उसकी पुस्तक का प्रतिवाद लिखिए। उसके तर्कों की समीक्षा कीजिए। खुली बहस कीजिए किंतु हूटिंग, बहिष्कार, धमकी, प्रतिमा भंजन या मंच से उतार देना लोकतंत्र की भाषा नहीं है। जहाँ संवाद समाप्त होता है, वहीं से कट्टरता प्रारंभ होती है।
विडंबना यह है कि हम अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा पर गर्व करते हैं, किंतु उसी परंपरा के मूल तत्व विचार स्वातंत्र्य को भूलते जा रहे हैं। विश्वविद्यालयों से लेकर साहित्यिक मंचों तक यदि भय का वातावरण होगा, तो अगला राहुल सांकृत्यायन, अगला धूमिल, अगला मुक्तिबोध जन्म लेने से पहले ही चुप हो जाएगा।
मूर्ति टूटने की सबसे बड़ी त्रासदी पत्थर का टूटना नहीं है। त्रासदी यह है कि उसके साथ समाज का आत्मविश्वास भी दरकने लगता है। जो समाज अपने विचारकों की रक्षा नहीं कर सकता, वह अंततः अपने विचारों की भी रक्षा नहीं कर पाता।
किसी सभ्यता की पहचान उसके मंदिरों, संसदों या स्मारकों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने असहमत नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। जो समाज विरोधी स्वर को भी सम्मान देता है, वही वास्तव में लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक कहलाने का अधिकारी है।
आज आवश्यकता मूर्तियाँ बचाने से पहले विचार बचाने की है। क्योंकि पत्थर फिर तराशे जा सकते हैं, पर एक स्वतंत्र विचारक का मौन इतिहास की सबसे बड़ी क्षति बन जाता है। सहयोग: विनायक फीचर्स

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