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ब्रेकिंग न्यूज: *आज लेखक की लेखनी से ज्यादा उसकी ‘लॉबिंग’ महत्वपूर्ण हो गई*! पढ़ें: क्यों प्रतिभा खिड़की से झांक रही…

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सोशल मीडिया के इस दौर में स्थिति यह है कि लेखक बाद में पैदा होता है, सम्मानों की ‘फ़ेहरिस्त’ पहले तैयार हो जाती है।

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हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी ‘अकादमी’ या ‘फाउंडेशन’ का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष है और एक दूसरे को ‘शताब्दी रत्न’ घोषित कर चुका है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ये चमचमाती ट्राफियां और शॉल, रचना की साहित्यिक गुणवत्ता की गारंटी हैं?

साहित्यिक गुणवत्ता किसी प्रयोगशाला में मापी जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि यह समय की कसौटी पर कसी जाने वाली निरंतरता तथा लेखन की पाठकीय पसंद , एवं उसकी उपयोगिता है।

लेकिन वर्तमान समय में ‘साहित्यिक गुणवत्ता’ और ‘पुरस्कार’ के बीच का संबंध कुछ वैसा ही हो गया है जैसा राजनीति और नैतिकता का होता है, दोनों साथ दिखते जरूर हैं, पर होते बहुत दूर हैं।

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आज लेखक की लेखनी से ज्यादा उसकी ‘लॉबिंग’ महत्वपूर्ण हो गई है।

गुणवत्ता घर की खिड़की से झांकती रह जाती है और ‘जुगाड़’ दरवाजे से अंदर आकर मुख्य अतिथि की कुर्सी संभाल लेता है। ऐसा हर छोटे बड़े पुरस्कार तथा सम्मान में देखने मिल रहा है।

सम्मान मिलते ही लेखक को लगने लगता है कि वह अब आलोचना से ऊपर है। यही आत्म-मुग्धता गुणवत्ता के क्षरण का सबसे बड़ा कारण बनती है।

इतिहास गवाह है कि प्रेमचंद को जीते-जी कोई बड़ा सरकारी सम्मान नहीं मिला, पर आज उनके बिना साहित्य अधूरा है।

दूसरी ओर, ऐसे सैंकड़ों ‘पुरस्कार प्राप्त’ लेखक हैं जिनकी किताबें आज कबाड़ के भाव भी कोई नहीं पढ़ना चाहता।

साहित्यिक गुणवत्ता का अंतर्संबंध पुरस्कारों से केवल तब ही सार्थक है, जब पुरस्कार ‘सृजन’ का परिणाम हो, न कि ‘अभियान’ का।

जब किसी योग्य रचना को सम्मानित किया जाता है, तो सम्मान की गरिमा बढ़ती है, रचना की नहीं। ऐसे पुरस्कार में विवाद नहीं होते ।

रचना तो अपनी गुणवत्ता के कारण पहले ही कालजयी हो चुकी होती है।समकालीन विडंबना इसके विपरीत इसलिए है, क्योंकि गुण धर्मियों की उपेक्षा कर लॉबी जनित राजनैतिक प्रभाव से पुरस्कार तय हो रहे हैं। आज के दौर में ‘सम्मान वापसी’ से लेकर ‘सम्मान पाने की होड़’ तक, साहित्य का बाजारवाद हावी है।

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गुणवत्ता कहीं हाशिए पर खड़ी इस बात का इंतज़ार कर रही है कि काश कोई पाठक बिना किसी ‘प्रशस्ति पत्र’ को देखे किताब के पन्ने पलटे।

“सच तो यह है कि असली पुरस्कार पाठक की वह आँखें हैं, जो आधी रात को आपकी किताब पढ़ते हुए नम हो जाती हैं।

बाकी सब तो ड्राइंग रूम की धूल झाड़ने वाली निर्जीव वस्तुएं हैं।” पुरस्कार और गुणवत्ता का अंतर्संबंध तब तक ही पवित्र है जब तक चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और रचना में ईमानदारी है।

यदि पुरस्कार केवल ‘रेवड़ियां’ बनकर बंटेंगे, तो वे गुणवत्ता को निखारने के बजाय उसे दफन करने का काम करेंगे। साहित्य को पदकों की नहीं, बल्कि उस ‘दृष्टि’ की जरूरत है जो समाज के अंधेरों को चीर सके। विनायक फीचर्स

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