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सामयिकी : *कहां जा रहे हैं हम* ? पूरे देश में महिला सुरक्षा को लेकर गोष्ठी आयोजित हो! पढ़ें महिला उत्पीड़न पर प्रधान संपादक की अपनी बात…

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हल्द्वानी। ( जीवन जोशी प्रधान संपादक) मंदिर से लौट रही बालिका के साथ वाहन चालक ने जिस तरह अपना चरित्र उजागर किया है उसे देख लगता है कि कानून की डर नहीं रह गई है! वरना भरी दोपहरी इतना घटिया कृत्य न होता!

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सरकार जितने कठोर कानून बना रही है उतना ही अपराध महिला के प्रति क्यों बढ़ रहा है समझ से परे है! मोबाइल फोन पर परोसा जा रहा पश्चिमी देशों का संस्कार भी इसमें कम सहायक नहीं दिखता!

महिलाओं के प्रति नजरिया बदले जाने की जरूरत है जंगल राज को खत्म किए बिना सभ्य समाज की कल्पनाओं को साकार नहीं किया जा सकता! कानून कैसा जिसका डर पैदा न हुआ! त्वरित न्याय प्रक्रिया को तेज किए जाने की आवश्यकता महसूस होती है!

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महिला अपराध में आरोपी पर आरोप सिद्ध हो जाने पर कठोर सजा जब तक नहीं दी जाती और जेल से जमानत न मिले तो इस अपराध पर काबू पाना संभव नहीं लगता! इस तरह के अपराधी को जेल से बाहर लाने वाले अधिवक्ता भी सकारात्मक निर्णय लें और ऐसे लोगों की जमानत न होने का निर्णय लें तो कुछ हद तक अपराध करने वाला डरेगा कि जमानत नहीं मिलेगी!

लेकिन सबको न्याय मिले ये भी लोकतंत्र का अधिकार है फिर कैसे इस महिला अपराध को रोका जाएगा इसे लेकर देश व्यापी अभियान चलाया जाए और गोष्ठी आयोजित कर लोगों के विचार लिए जाएं कि क्यों नहीं लोगों की मानसिकता बदल रही है!

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पूरे देश में महिला उत्पीड़न की बढ़ती घटना एक बहस की आवश्यकता की तरफ इशारा कर रही है कि क्यों नहीं कानून के साथ ही सामाजिक रिश्ता बनकर जगह बना रहा है! बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है हर अभिभावक आज सोच में पड़ गया है!

मंदिर से आ रही बालिका को एक मुस्लिम वाहन चालक ने जिस तरह छेड़ कर अपना चरित्र उजागर किया है वह समाज को झक झोर रहा है और चिंता बढ़ गई है कि हम कहां जा रहे है ? कैसे देश की तरफ हमारा भविष्य बढ़ रहा है ? देश व्यापी बहस होनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति की जरूरत क्यों बढ़ गई है।

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