

भारतीय वाङ्मय में काल के प्रवाह को केवल अंकों या गणनाओं में नहीं बाँधा गया है, बल्कि इसे एक जीवंत इकाई माना गया है, जहाँ प्रत्येक तिथि अपने भीतर एक विशिष्ट ऊर्जा और आध्यात्मिक संदेश समेटे होती है।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, जिसे संपूर्ण भारत बड़े श्रद्धाभाव से ‘अक्षय तृतीया’ या ‘आखातीज’ के रूप में मनाता है, इसी जीवंत परंपरा का चरमोत्कर्ष है। ‘अक्षय’ शब्द अपने आप में पूर्णता का बोध कराता है,वह जिसका कभी क्षय न हो, जो समय की सीमाओं से परे सदा बना रहे।
यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था, सामाजिक उत्तरदायित्व और आधुनिक प्रशासनिक सुधारों का एक अद्भुत संगम है, जो हमें विनाशशील भौतिकता से ऊपर उठकर अविनाशी सत्कर्मों की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
अक्षय तृतीया की महत्ता को समझने के लिए इसके पौराणिक और आध्यात्मिक धरातल को देखना आवश्यक है, जहाँ यह तिथि सत युग और त्रेता युग जैसे महान कालखंडों के आरंभ बिंदु के रूप में प्रतिष्ठित है। यह वह पावन दिन है जब भगवान विष्णु ने अपने छठे अवतार परशुराम के रूप में पृथ्वी पर अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लिया था।
इसी दिन पतित-पावनी गंगा का स्वर्ग से धरा पर आगमन हुआ, जिससे मानवता को शुचिता और जीवन का आधार प्राप्त हुआ। माता अन्नपूर्णा का प्राकट्य भी इसी तिथि को माना जाता है, जो हमें यह स्मरण कराता है कि संसार का पोषण केवल अन्न से नहीं, बल्कि सेवा और करुणा के भाव से होता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन स्वयं के भीतर के उस प्रकाश को जगाने का है जो कभी मंद नहीं पड़ता। शास्त्रों की मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप और तप ‘अक्षय’ हो जाता है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में केवल वही संपदा हमारे साथ रहती है जिसे हमने निस्वार्थ भाव से दूसरों को अर्पित कर दिया है।
भौतिक वस्तुएं समय के साथ लुप्त हो सकती हैं, लेकिन आत्मा के गुणों का संचय कभी समाप्त नहीं होता, यही इस पर्व का मूल आध्यात्मिक सार है।
भारतीय समाज में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ की संज्ञा दी गई है, जो इसे ज्योतिषीय गणनाओं से भी ऊपर एक सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में स्थापित करती है।
इस दिन किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि सूर्य और चंद्रमा की स्थिति इस समय अपनी उच्चतम ऊर्जा में होती है। इसी सुलभता के कारण यह दिन सामूहिक विवाहों के लिए एक बड़े सामाजिक मंच के रूप में उभरा है।
सामूहिक विवाह की यह परंपरा केवल आर्थिक सुलभता का साधन नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज में बढ़ती फिजूलखर्ची और दिखावे की संस्कृति पर एक करारा प्रहार है।
जब एक ही मंडप के नीचे विभिन्न आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के परिवार साथ आते हैं, तो जातिगत भेदभाव की दीवारें ढहने लगती हैं और एक समरस समाज की नींव पड़ती है।
यह आयोजन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए गरिमापूर्ण जीवन की शुरुआत का माध्यम बनते हैं, जहाँ आडंबर के स्थान पर आशीष और सद्भाव को प्राथमिकता दी जाती है।
अक्षय तृतीया का एक और महत्वपूर्ण पहलू कृषि संस्कृति से जुड़ा है। किसान इस दिन को नई फसल और नई उम्मीदों के प्रारंभ के रूप में देखते हैं।
कृषि महोत्सवों के माध्यम से जैविक खेती और उन्नत बीजों का वितरण इस बात का प्रतीक है कि हमारी प्रगति की जड़ें आज भी मिट्टी से जुड़ी हैं। ‘अक्षय कृषि’ का विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखने का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
जब हम अपनी परंपराओं को आधुनिक विज्ञान और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ देते हैं, तो अक्षय तृतीया जैसा पर्व केवल एक दिन का उत्सव न रहकर समाज के सर्वांगीण विकास का इंजन बन जाता है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि समृद्धि केवल स्वर्ण के क्रय में नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति हमारी संवेदनशीलता में निहित है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो अक्षय तृतीया भारतीय मेधा और संस्कृति का वह आलोक है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। आज के दिन सोना खरीदने की भी परंपरा है।
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