

भारत में सूर्य आदिकाल से ही जन आस्था, श्रद्धा, आराधना एवं उपासना का केन्द्र रहा है।
वैदिक काल में सूर्य की उपासना एवं पूजा अपने चरमोत्कर्ष पर थी। भारत के विभिन्न भागों में बने भव्य सूर्य मंदिर इस तथ्य को उजागर करते हैं कि हर युग में भारत में सूर्य की आराधना एवं उपासना प्रचलित रही है।
खगोलशास्त्रियों ने जब सूर्य की गति का पता लगाया तो सूर्य उपासना की एक नई पद्धति प्रचलित हुई। सूर्य जब नभमंडल में एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब उसे संक्रांति कहा जाता है।
इस तरह हर वर्ष बारह संक्रांतियां होती हैं पर इसमें सबसे महत्वपूर्ण संक्रांति मकर संक्रांति कहलाती है। इस दिन सूर्य धनुराशि से मकर राशि में प्रवेश करता है।
चूंकि सूर्य 365 दिनों अर्थात् एक वर्ष की निश्चित अवधि में बारह राशियों का भ्रमण कर डालता है, इसलिए मकर संक्रांति आमतौर पर एक निश्चित दिन अर्थात् चौदह जनवरी को ही होती है। कभी-कभी यह 15 जनवरी को भी होती है।
पर होती तभी है जब सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है। भारतीय मान्यता के अनुसार इस दिन का एक और विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है।
भारत में उत्तरायण के सूर्य का विशेष महत्व है। हर शुभ काम के लिए तभी मुहूर्त निकाला जाता है जब सूर्य उत्तरायण में हो। उत्तरायण में सूर्य का झुकाव उत्तर की ओर होता है।
सूर्य के उत्तरायण में होने का भारत में कितना महत्व है, इसका प्रमाण हमें महाभारत में मिलता है। भीष्म पितामह ने दक्षिणायण के सूर्य के समय अपनी देह नहीं त्यागी थी, क्योंकि वे स्वर्ग में प्रवेश उत्तरायण के सूर्य में करना चाहते थे।
मकर संक्रांति भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न नामों के साथ मनाई जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन अलग-अलग पद्धतियां भी अपनाई जाती हैं पर सबका उद्देश्य एक ही है- सूर्य की उपासना एवं आराधना।
इस दिन पवित्र नदियों, सरोवरों एवं कुण्डों में स्नान करने, दान करने एवं सूर्य को जल चढ़ाने का बड़ा धार्मिक महत्व है।इसीलिए मकर संक्रांति के दिन तीर्थ स्थलों पर हजारों नर-नारी स्नान करते हैं एवं दान करते हैं।
शीतकाल होने के कारण इस दिन तिल्ली और गुड़ के सेवन तथा दान को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन तिल को पीसकर उबटन बनाकर उसे लगाया जाता है फिर स्नान किया जाता है। दान में भी तिल और गुड़ से बनी वस्तुएं दी जाती हैं।
उत्तर भारत में इस दिन तिल एवं खिचड़ी खायी जाती है तथा इन्हीं वस्तुओं का दान किया जाता है। बंगाल तथा उड़ीसा में भी यही प्रथा प्रचलित है। महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत में सौभाग्यवती स्त्रियां, दूसरी सौभाग्यवती स्त्रियों को विभिन्न वस्तुएं भेंट करती हैं।
महाराष्ट्र में इस प्रथा को हल्दी- कुमकुम कहा जाता है। इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियों को हल्दी एवं कुमकुम के तिलक लगाए जाते हैं। पंजाब में इस दिन होली भी जलाई जाती है, वहां मकर संक्रांति को लोहड़ी कहा जाता है।
कई स्थानों पर इस दिन बालक और युवक पतंग उड़ाते हैं। ब्राह्मण इस दिन अपने यज्ञोपवीत बदलते हैं। ब्राह्मणों को अनाज एवं खाद्य पदार्थों से भरे बर्तन भी दिए जाने की कई क्षेत्रों में प्रथा है।
मकर संक्रांति का यह पर्व आरोग्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। तिल एवं गुड़ के सेवन से शरीर में शीतजनित व्याधियां एवं बीमारियां दूर हो जाती हैं। तिल के उबटन से त्वचा की कांति बढ़ती है।
भारतीय धर्मग्रंथ तो मकर संक्रांति के महत्व से भरे पड़े हैं। इस दिन स्नान एवं दान की भी महत्ता इन ग्रंथों में पढऩे को मिलती है।
एक धार्मिक कथा के अनुसार सूर्य की उपासना एवं मकर संक्रांति के व्रत के फलस्वरूप यशोदा को पुत्र के रूप में कृष्ण प्राप्त हुए थे। वस्तुत: हमारा प्रत्येक पर्व, उत्सव एवं त्यौहार किसी आराध्य देव से जुड़ा हुआ है।
मकर संक्रांति का यह पर्व उस सूर्य की उपासना एवं आराधना का त्यौहार है जो हमें इस पृथ्वी पर जन्म के साथ ही प्रकाश, जीवन और आरोग्य देता रहा है और अनंत काल तक देता रहेगा। सहयोग: विभूति फीचर्स
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