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ब्रेकिंग न्यूज: वनों का सफाया कब तक! चिपको आंदोलन आज भी प्रासंगिक! पढ़ें विकास के नाम पर कितने पेड़ हैं निशाने पर…

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देहरादून। एक बार फिर चिपको आंदोलन की याद पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पर्यावरणविद करने लगे हैं! चंडीप्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा के विचार प्रासंगिक हो चले हैं! बताया जाता है कि प्रदेश में हजारों पेड़ों को काटने से जुड़ा प्रस्ताव चर्चा में आ चुका है।

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बताया जाता है ना केवल वन विभाग बल्कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में वन मंत्री और तमाम अधिकारी भी इस प्रस्ताव पर चर्चा कर चुके हैं।

विदित है कि इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर यदि भविष्य में इसे मंजूरी मिली तो प्रदेश में हजारों पेड़ों पर आरियां चलना तय है।

सूत्रों के मुताबिक विधानसभा यमकेश्वर के स्वर्गीय जगमोहन सिंह नेगी मोटर मार्ग को डबल करने पर विचार चल रहा है।

बताया जाता है इसके तहत ऋषिकेश बैराज से पीपल कोटी तक करीब 28 किलोमीटर की सड़क को डबल लेन किए जाने की योजना है।

इसके साथ ही नीलकंठ मोटर मार्ग की 5 किलोमीटर सड़क को भी डबल लेन करने के लिए चौड़ीकरण का काम प्रस्तावित है। इसके कारण करीब 3045 पेड़ प्रभावित हो रहे हैं।

बताया जाता है कि इस योजना पर मुहर लगी तो राजाजी टाइगर रिजर्व का बफर जोन भी इससे प्रभावित होगा, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान की गौहरी रेंज के लक्ष्मण झूला क्षेत्र के कोर जोन में यह मार्ग प्रस्तावित है।

जिसमें 3045 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव है, इतना ही नहीं करीब 6 किलोमीटर बिजणि क्षेत्र के बफर जोन में भी 768 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव है। इस तरह इस मार्ग के लिए कुल 3813 पेड़ काटे जाने हैं।

सीएम पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता वाले राज्य वन्य जीव बोर्ड ने इस मार्ग के चौड़ीकरण पर विचार किया और हजारों पेड़ों के योजना की जद में आने के कारण इस पर एक्सपोर्ट कमेटी बनाने का निर्णय लिया गया है।

एक्सपर्ट कमेटी रिपोर्ट के आधार पर ही योजना को आगे बढ़ाया जाएगा। उत्तराखंड में पेड़ों को काटे जाने का मुद्दा आम लोगों से जुड़ा रहा है, स्थिति यह है कि सैकड़ों पर्यावरण प्रेमी इन मुद्दे को लेकर सड़कों पर भी दिखाई दिए हैं।

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आंकड़े भी यह जाहिर करते हैं कि प्रदेश में विकास के नाम पर किस तरह अंधाधुंध पेड़ों का कटान किया जा रहा है, वन विभाग के ही एक आंकड़े के अनुसार प्रदेश में पिछले 10 सालों में अब तक 10000 से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं।

इस तरह राज्य में हर साल औसतन 1000 पेड़ों को विकास के नाम पर काटा जा रहा है। पेड़ कटान पर एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट होगी ।

चिपको आंदोलन रहा हो या फिर उत्तराखंड में अक्सर आंदोलन करते पर्यावरण प्रेमी देहरादून समेत तमाम शहरों के तापमान में बढ़ोतरी के विषय को भी उठाते रहे हैं।

पेड़ करने से कभी जिन स्थानों पर बर्फबारी होती थी वहां अब बारिश होती है और राज्य के कई इलाके गर्मियों में 40 डिग्री से अधिक भी रिकॉर्ड किए जा रहे हैं।

लोगों की राय है कि यह स्थिति आम लोगों को प्रभावित कर रही है और तमाम पर्यावरण प्रेमियों के आंदोलन की तरफ भी उन्हें खींच रही है।

पर्यावरण प्रेमी इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग और मैदानी क्षेत्रों में तेजी से कट रहे पेड़ों को इसकी मुख्य वजह मान रहे है।

बताते चलें पर्यावरण प्रेमी विकास विरोधी नहीं हैं, उनका सिर्फ इतना कहना है कि जिस योजना को तैयार कर रहे हैं उसमें पर्यावरण के पहलू को नजरअंदाज ना करें।

लोगों का मानना है कि कोशिश यह हो कि योजना स्वीकृत होने से पहले यह तय कर लिया जाए की कम से कम वृक्षों को हटाए जाने की जरूरत हो।

जन मत है कि यदि कोई प्रोजेक्ट बेहद जरूरी है तो हटाए जाने वाले वृक्षों के बदले पहले ही वृक्षारोपण किया जाए ताकि पर्यावरण का संतुलन बना रहे।

लोगों का कहना है कि उत्तराखंड अपना वन क्षेत्र बढ़ा रहा है और पर्यावरण संरक्षण में राज्य का अहम योगदान भी है। चिपको आंदोलन जैसे पर्यावरण संरक्षण से जुड़े जनता के अभियान ने न केवल देशवासियों बल्कि दुनियाभर का ध्यान भी खींचा है।

उत्तराखंड में पर्यावरण प्रेमियों और पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में काम करने वालों की कोई कमी नहीं है। पर्यावरण प्रेमियों के सड़कों पर आकर आंदोलन करने और इस दबाव में सरकार के वृक्षों को काटने की योजना से कदम पीछे खींचने के भी कई उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं।

ऋषिकेश -भानियावाला मार्ग पर सड़क चौड़ीकरण की योजना के लिए करीब 3 हजार पेड़ कटान की योजना का हाल ही में विरोध हुआ।

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इसके लिए तमाम पर्यावरण प्रेमी सड़कों पर उतर आए थे, इतना ही नहीं सरकार का विरोध करते हुए दबाव बनाने के अलावा कुछ लोग हाईकोर्ट की शरण में भी गए।

इसके बाद हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी इसी तरह सहस्त्रधारा रोड चौड़ीकरण का मामला भी विवादों में रहा। रोड के किनारे मौजूद वृक्षों पर निशान लगाए गए तो तमाम छात्र और पर्यावरण प्रेमी सड़क पर पहुंच गए।

इसके बाद सरकार ने भी पर्यावरण प्रेमियों को सड़क चौड़ीकरण के नाम पर कम से कम पेड़ों के प्रभावित होने का आश्वासन दिया था।

इसी तरह हाथीबड़कला क्षेत्र में भी सड़क चौड़ीकरण की योजना बनाई गई और इसमें 200 से ज्यादा पेड़ चिन्हित किए गए थे, इसके बाद पर्यावरण प्रेमी सड़कों पर आए तो सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और खुद मुख्यमंत्री ने पेड़ ना काटे जाने का आश्वासन दिया।

इसी क्रम में झाझरा आशारोड़ी से पोंटा साहिब रोड के लिए 4000 से ज्यादा पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव बना और इस पर सूचना मिलते ही पर्यावरण प्रेमी मौके पर पहुंचकर इसके विरोध में जुड़ने लगे।

इस आंदोलन में बड़ी बात यह थी कि युवा और स्कूली छात्र भी इसमें शामिल हुए और उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐसे विकास के खिलाफ अपना पक्ष रखा।

इसी तरह खलंगा में साल के जंगल को काटने के लिए भी प्रस्ताव तैयार किया गया और पेड़ों के चिन्हिकरण के लिए इनकी छाल पर निशान भी लगा दिए गए।

इस बार योजना पेयजल को लेकर थी और यह दावा था कि देहरादून शहर में पेयजल की यह योजना बेहद जरूरी है। सॉन्ग बांध परियोजना के पानी का ट्रीटमेंट प्लांट इस क्षेत्र में बना था लेकिन पर्यावरण प्रेमियों ने 2000 पेड़ों को काटने के इस प्रस्ताव का विरोध शुरू कर दिया।

इससे पहले कांग्रेस सरकार में नैनीताल जनपद के गोला रेंज में अंग्रेज सरकार के समय लगाए गए सालबनी के जंगल को खत्म कर दिया गया। बेहिसाब जंगल काटकर वन निगम के डिपो में कीमती लकड़ी को सड़ाया जा रहा है फिर उसे ओने पौने दाम में नीलाम किया जा रहा है।

लोगों ने सरकार से मांग की है कि अंधा धुन्ध पेड़ों के कटान पर रोक लगनी चाहिए जिससे इस राज्य की प्राकृतिक विरासत को बचाया जा सके।

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